सुकोशल स्वामी-('जा सुत विरह मरी हुई बाघिन, ता सुत देह विदारी')माता सहदेवी पुत्रवियोग में मर कर व्याघ्री हुई उसी के द्वारा अपने प्रिय पुत्र का भक्षण किये जाने पर भी उपसर्ग समता से सहन किया और सर्वार्थसिद्धि गये। समाधि 0 – भेजें
रामचन्द्रजी ने आभार- जब रामचन्द्रजी दिग्विजय करके अयोध्या को वापस आये तब उन्होंने सब सहयोगियों के लिये कृतज्ञता ज्ञापित की, जब हनुमानजी का क्रम आया, तब रामचन्द्रजी ने कहा-हे हनुमन्त ! तुमने जो आज तक उपकार किया है उसके लिये मैं आभारी हूँ लेकिन मैं चाहता हूँ आपका उपकार न करूँ, इस वाक्य को सुनकर लोग आश्चर्य चकित हुये, किन्तु हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुये, तब लोगों ने हनुमान जी से पूँछा आप लोगों की भाषा हम लोगों के समझ में नहीं आयी कृपया कर समाधान करें, तब हनुमान जी ने कहा कि रामचन्द्र जी यह कह रहे हैं कि आपको कभी कष्ट ही न आये। विनम्रता 0 – भेजें
तुंकारी की क्षमा- राजा की लड़की को कोई तू करके नहीं बोल सकता था, उसका घर में तो निर्वाह हो गया, लेकिन उसकी ऐसी तीव्र कषाय देखकर कोई शादी करने को तैयार नहीं होता था, बड़ी मुश्किल से एक राजकुमार को तैयार किया कि आप मेरी लड़की से कभी तू करके नहीं पुकारना, शादी हो गयी। अचानक एक दिन उस लड़के ने भूल से तू बोल दिया वह इतनी कुपित हुयी कि घर छोड़कर चली गयी। जङ्गल में अकेली जा रही थी भीलों ने उसे पकड़ लिया बहुत कष्ट दिया, शील से गिराने की कोशिश की लेकिन वह अपने में अडिग रहीं, अन्त में भीलों ने उसे एक कपड़ा रङ्गने वाले को बेच दी, वहाँ भी भयङ्कर कष्ट उठाने पड़े वह तुंकारी के माथे से खून निकालता और कपड़े रङ्गता था लेकिन थोड़ी देरमें जड़ी बूटी लगाकर घाव भर देता था। ऐसे कष्टों को सहन करने से अब जीवन में क्षमा गुण आ गया। एक नगर में श्मशान घाट पर मुनि तप कर रहे थे, एक तन्त्र वादी वहाँ आया और उसने मुर्दे इकट्रे किये चूल्हा बनाया, उसे ये नजर नहीं आया कि ये मुनिराज ध्यान मग्न हैं, उसने आग लगाकर कढ़ाही रखी मुनि सहन करते रहे, लेकिन बीचमें शरीर वेदना से हिल गया, कढ़ाही गिर गई उसने सोचा यहाँ कोई भूत आ गया, डर कर भाग गया। मुनि वहीं पड़े रहे, प्रातः काल एक सेठ उस ओर अपने कार्य से आया मुनि की ऐसी अवस्था देख घबराया, अपने घर ले गया इलाज किया, वैद्य ने लाक्षादि तैल लगाने को कहा और वह तुङ्कारी के यहाँ मिलेगा लेने गया भाग्य से सात घड़े तैल के सेठ से फूट गये लेकिन उसने क्रोध नहीं किया, सेठ ने उससे इसका राज पूँछा तब तुङ्कारी ने अपनी सारी कहानी बतायी। क्षमा 0 – भेजें