Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 12

सिद्धसेन का शास्त्रार्थ।

7 सूत्र

बोर्ड पर कक्षा, विषय, दिनाँक लिखें, शिक्षक की दृष्टि छात्र पर रहे, इससे विद्यार्थी की श्रद्धा बढ़ेगी, आपकी पक्की मास्टरी होगी।
ज्ञान
पीछे वाले विद्यार्थी से ये न कहें कि 'सुनाई पढ़ रहा है या नहीं', उससे सरल प्रश्न पूँछलें।
ज्ञान
वक्ता धर्मसभा में पास हो जाते हैं, किन्तु पर्व में महावीर जयन्ती, अक्षय तृतीया, दीवाली, आदि में फैल हो जाते हैं, वहाँ सामान्य जनसमुदाय वाला उपदेश होना चाहिए विद्वानों की अपेक्षा बच्चों को समझाना कठिन है।
वाणी
सम्मइ सूत्र के कर्ता आचार्य सिद्धसेन बहुत बड़े वादी थे, नगर-नगर में जाकर वाद करते थे और जीत लेते थे, एक बार एक नगर में गये, पता लगा यहाँ कोई अत्यन्त निपुण वादी है, अभी जङ्गल गया है, सिद्धसेन जी जङ्गल चले गये जैसे-तैसे उसको ढूँढ़ लिया, सिद्धसेनजी ने कहा हमसे वाद करो, उसने कहा भाई राजा के सामने वाद करना ठीक है नहीं तो निर्णय कौन करेगा, सिद्धसेनजी नहीं माने बोले ग्वालों को बुलाओ गाय श्रोता होगीं ग्वाले जज होंगे, ऐसा ही किया, सिद्धसेनजी दो घण्टे तक संस्कृत में बोलते रहे, ग्वाले संस्कृत क्या जानें? प्रतिवादी आया उसने बढ़िया नाचना गाना प्रारम्भ किया, सब ग्वाले प्रसन्न हो गये, तब सिद्धसेनजी ने कहा भैया तुम जीते हम हारे, 'वक्ता को द्रव्य, क्षेत्र, काल का जानने वाला होना चाहिए'।
वाणी
जो वक्ता शादी के समय कहे संसार असार है और मृत्यु के समय कहे बन्ना-बन्नी के गीत गाना चाहिए वह क्षेत्रकाल का ज्ञाता नहीं है।
विवेक
कौओं जैसी चेष्टा, बगुले जैसी एकाग्रता, कुत्ते जैसी निद्रा, अल्पाहार, गृहत्याग ये विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं।
ज्ञान
मूर्ख बेटे से पिता ने बार-बार कहा कि तू व्यापार नहीं कर सकता, न मजदूरी न भीख माँग सकता है, अत: वेद पढ़ेविना तेरा जीवन बेकार है, वह घर से भागा गङ्गा किनारे जाकर बैठ गया, बोला हे गङ्गा मैया जब तक मैं विद्वान नहीं बन जाऊँगा तब तक आहार जल का त्याग है, कई दिन हो गये, इन्द्र का आसन कम्पायमान हुआ, इन्द्र ने अप्सराओं को भेजा, अप्सराएं विप्र का वेश बनाकर मुट्ठी में रेत भरकर गङ्गा में फेंकने लगी, लड़के ने देखा पूछा ये क्या कर रही हो? अप्सराओं ने कहा हमें गङ्गा पार जाना है इसलिये पुल बना रहे हैं, उसने कहा ऐसे पुल नहीं बनता तो अप्सराओं ने कहा उसी प्रकार कोई भोजन छोड़कर विद्वान नहीं बनता अक्षर-अक्षर रटता पढ़ता है।
पुरुषार्थ