Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 5 / 11

ज्ञानी पुरुषों को ही इस संसार में भय नहीं होता है।
ज्ञान
मस्तिष्क के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है जितनी शरीर को व्यायाम की।
ज्ञान
चाहे सैकड़ों सूर्य उदित हों, चाहे सैकड़ों चंद्रमा अंतःकरण का अंधकार विद्वानों के वचनों के बिना नष्ट नहीं होता है।
ज्ञान
विद्वान् अकल का थोक विक्रेता होता है।
ज्ञान
सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ? विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ? सुख की चाह हो तो विद्या छोड़ दे और विद्या की चाह हो तो सुख का त्याग करें।
ज्ञान
विद्यावान व्यक्ति का सम्मान धनवान और चरित्रवान भी करते हैं।
ज्ञान
विद्या से युक्त व्यक्ति को कोई मूर्ख नहीं बना सकता है।
ज्ञान
विद्या विधाता से मिलन का सर्वश्रेष्ठ विधान है।
ज्ञान
जिसके पास विद्या है उसके पास कुछ न होकर भी सब कुछ है।
ज्ञान
जिस नई बात या ज्ञान का पता विद्यार्थियों को चले, तो उसे वह अपनी मातृभाषा में लिख लें और भविष्य में यथा समय और यथा अवसर पर उसका उपयोग करें।
ज्ञान
विद्वान् होकर शांत रहना, कल्याण कारी है।
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वह सभा वनस्थली है जिसमें विद्वान् नहीं हैं।
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समाचारपत्र साधारण जनता के शिक्षक हैं।
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सम्यग्ज्ञान से बढ़कर प्रकाश और अज्ञान से बढ़कर अंधकार कोई नहीं है।
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सम्यग्ज्ञान की अंतिम मंजिल मोक्ष है।
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स्वाध्याय ही प्रगति का द्वार है।
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स्वाध्याय के बिना मानसिक विकास नहीं हो सकता है।
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स्वाध्याय से बढ़कर सज्जनों के लिए कोई अच्छी आदत नहीं हो सकती है।
ज्ञान
ज्ञान का मूल्य बहुमूल्य रत्न से भी अधिक है ज्ञान का निरादर अपने ही मस्तिष्क का अपमान है।
ज्ञान
सच्चे ज्ञान की एकमात्र पहचान है सिखाने की शक्ति।
ज्ञान
सच्चा ज्ञान वही है, जो आपको अहित से रोके और कष्टों में भी मुस्कुराहट पैदा करा दे। ज्ञान का मद ही अज्ञान का प्रदर्शन है।
ज्ञान
ज्ञान के साथ चरित्र अमृत का पान है और ज्ञान के साथ भोग विष के सामन हैं।
ज्ञान
कोरा चरित्र खतरनाक नहीं होता है, कोरा ज्ञान खतरनाक होता है।
ज्ञान
सच्चा ज्ञान त्याग कराता है और सत्संग की प्यास जगाता है।
ज्ञान
सम्यग्ज्ञान पदार्थों को छोड़ने की बात करता है।
ज्ञान
जिससे तत्त्व का बोध होता है, जिससे मन का निरोध होता है, जिससे आत्मा शुद्ध होती है, जिनशासन में उसका नाम है ज्ञान।
ज्ञान
मेघ चाहे उपाधियाँ व जागीरें बरसा दें, धन चाहे हमें खोजे किन्तु ज्ञान को तो हमें ही खोजना पड़ेगा।
ज्ञान
ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं है।
ज्ञान
पालने से लेकर श्मशान तक ज्ञान प्राप्त करते रहो।
ज्ञान
सत्य की खोज में किए गए प्रयास का नाम विज्ञान है लेकिन सत्य का प्रतिपादन करने वाले ज्ञान का नाम वीतराग विज्ञान हैं।
ज्ञान
कुछ पुस्तकें चखने के लिए, कुछ चबाने के लिए कुछ घोलकर पी जाने के लिए होती हैं।
ज्ञान
अनेक महागुरुओं से हम साक्षात् नहीं मिल सकते लेकिन उनकी पुस्तकें हमारा सही मार्ग दर्शन कर सकती हैं।
ज्ञान
शिक्षा बुढ़ापे के लिए सबसे अच्छा प्रावधान है।
ज्ञान
शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है, एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पाता है, शिक्षा सौन्दर्य और यौवन को भी परास्त कर देती है।
ज्ञान
ज्ञानवान ही विनयवान और विवेकवान होता है।
ज्ञान
हम किताबी ज्ञान अर्जित करते हैं लेकिन वास्तविक परिस्थितियों से दूर रहते हैं, प्रेक्टीकल शिक्षा नहीं दी जाती है, जीवन भर काम आने वाले आवश्यक विषयों को स्कूल या कॉलेज में कभी नहीं पढ़ाया जाता है।
ज्ञान
हमारे विचारों में क्रांति लाने वाले विषयों और लेखकों को शिक्षा प्रणाली में शामिल नहीं किया जाता है।
ज्ञान
ज्ञानी वही होता है जो शत्रु में भी गुण देखता है।
ज्ञान
अज्ञानी मनुष्यों का जीवन शून्य है, बन्धुहीन की दिशाएँ शून्य हैं, पुत्र रहित का घर शून्य है और दरिद्र का सर्व शून्य है।
ज्ञान
अज्ञान दूर होने से मनोविकार दूर होता है।
ज्ञान
अध्यात्म शास्त्र चित्त को चारित्र में स्थिर करा देता है।
ज्ञान
श्रुतज्ञान का अभ्यास किए बिना तपश्चरण करने वाला अज्ञानी संसार के सुखों में अनुरक्त रहता है।
ज्ञान
साबुन शारीरिक मैल व ज्ञान मानसिक मैल दूर करता है अतः स्नान की भाँति प्रतिदिन ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।
ज्ञान
ज्ञानी अपने से बड़े ज्ञानी के समक्ष अपना ज्ञान लुटाता नहीं उनका ज्ञान लूटना चाहता है।
ज्ञान
ज्ञान शून्य वैराग्य अन्दर राग को जन्म देता है।
ज्ञान
जिस ज्ञान का असर हमारे चारित्र पर नहीं होता है, वह ज्ञान हमारे कुछ काम का नहीं है।
ज्ञान
पानी कीचड़ भी करता है और उसको साफ भी करता है उसी प्रकार ज्ञान जब अहंकार की धूल के साथ होता है तो कीचड़ करता है और चारित्र के साथ होता है तो भगवान् बनाता है।
ज्ञान
आज समय विपरीत है, तपस्वी की भी ज्ञान के बिना कोई कीमत नहीं होती है।
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संसार में ज्ञान से बड़ा सुख नहीं है और अज्ञान से बड़ा कोई दुःख नहीं है।
ज्ञान
ज्ञानी छुपके बैठता है लेकिन ज्ञान का प्रकाश उसे जाज्वल्यमान कर देता है।
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ज्ञानी सुनता समझता अधिक है, बोलता कम है। जिन्दगी जीने मिली मात्र सोचने नहीं।
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ज्ञान से बड़ा धन और चारित्र से बड़ा धर्म कोई नहीं है।
ज्ञान
जो व्याकरण शास्त्र के अध्ययन बिना पदार्थों का विवेचन करता है वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, समुद्र को भुजाओं से तैरना चाहता है।
ज्ञान
जो व्याकरण के अध्ययन बिना सभा के बीच बोलना चाहता है वह वन में मदोन्मत्त हाथी को मृणाल सूत्र से बाँधना चाहता है।
ज्ञान
जैसे शादी का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है वैसे ही ज्ञान का फल वैराग्य है, वैराग्य का फल दीक्षा और दीक्षा का फल मुक्ति है।
ज्ञान
विनयपूर्वक किया हुआ श्रुत का अध्ययन, यदि प्रमादवश भूल जाता है तो भी भविष्य में केवलज्ञान प्राप्त कराता है।
ज्ञान
हजार मूर्खों की अपेक्षा एक पंडित श्रेष्ठ होता है।
ज्ञान
विद्या माता की तरह रक्षा करती है, पिता के समान हित में नियुक्त करती है, स्त्री के समान हर्षित करती है, भाई का समस्त कार्य करती है, आजीविका चलाती है, अनुपम कीर्ति फैलाती है और लोक में प्रियता उत्पन्न करती है।
ज्ञान
जो मनुष्य प्रायश्चित्त, आयुर्वेद, ज्योतिष और धर्म निर्णय की बात शास्त्र के बिना कहता है, उसे ब्रह्म घाती कहते हैं।
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विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं।
ज्ञान
विचार में जो अनेकान्त है वही वाणी में स्याद्वाद है।
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जो विद्या आपको आलस, अनीति, असंयम की ओर धकेले उसे प्राप्त करने की अपेक्षा अशिक्षित रहना अच्छा है।
ज्ञान
देशाटन, पण्डित जनों के साथ मित्रता, उत्तम स्त्री, राज सभा में प्रवेश और अनुकूल अनेक शास्त्रों का अवलोकन ये पाँच चतुराई प्राप्त करने के मूल कारण हैं।
ज्ञान
उत्तम विद्या से युक्त के लिए विदेश क्या है? मधुरभाषी को पराया कौन है?
ज्ञान
पढ़ते रहने से दिमाग को नॉलेज बढ़ाने के लिए सामग्री मिलती है, लेकिन जो पढ़ा है उसके बारे में सोचने से ही जानकारियों को अपनाया जा सकता है।
ज्ञान
आप अपने घर ग्रन्थ जरूर रखना, यह मत सोचना की कोई पढ़ने वाला नहीं है क्योंकि हो सकता है आपके घर कोई ऐसा महापुरुष जन्म ले जो इस ग्रन्थ को पढ़कर निर्ग्रन्थ बन जाये और यदि संस्कृति पर उपसर्ग आया और जिनालय व जिनवाणी नष्ट हो गयी तो आपके घरों की जिनवाणी से जैन धर्म जयवंत हो सकेगा। क्योंकि पहले भी हमारे ग्रन्थों की छह माह तक होलियाँ जली हैं, जिनमंदिर व जिनबिम्ब तोड़े गये हैं।
ज्ञान
उस ग्रन्थ के पढ़ने से क्या प्रयोजन जो हृदय को कंपित न करें।
ज्ञान
जो शिक्षण कराने का सामर्थ्य रखता है उसे कभी सीखना नहीं छोड़ना चाहिए।
ज्ञान
शास्त्रों में निरन्तर लगी हुई बुद्धि मुक्ति स्त्री को प्राप्त करने के लिए दूती के समान है अतः संसार से भयभीत भव्य जन शास्त्र में बुद्धि लगावें।
ज्ञान
शास्त्र वही श्रेष्ठ है जो संसार सागर से पार होने की शिक्षा दे, ग्रन्थ वही नेक है जो निर्ग्रन्थ बनने की प्रेरणा दे, बाकी जो संसार से बांधे वह शास्त्र नहीं शस्त्र हैं।
ज्ञान
जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, वे हमारी सबसे अधिक सहायक होती हैं।
ज्ञान
वह स्थान मन्दिर है जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किन्तु चेतना युक्त देवता निवास करते हैं। सच्ची शिक्षा का लक्ष्य बुद्धिमत्ता के साथ चरित्र का विकास करना है।
ज्ञान
ज्ञान के लिए किया जाने वाला कर्म, सभी कर्मों में श्रेष्ठतम है।
ज्ञान
जिस व्यक्ति में कल्पना है पर विद्वत्ता नहीं, उसके पंख हैं परन्तु पैर नहीं हैं।
ज्ञान
शास्त्रों से विहीन घर खिड़कियों से विहीन भवन के समान है।
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