Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 72

पुण्य की महिमा।

12 सूत्र

क्षमा आदिक दस धर्म, बारह व्रत, उत्कृष्ट श्रावक का आचार, बारह तप, समीचीन मुनि के लिए चार प्रकार का आहारादि दान देना, ज्ञान-ध्यान आदि का अभ्यास करना, जिनेन्द्र देव की पूजा करना, समीचीन धर्म के धारक पुरुषों का सम्मान करना, सद्गुरुओं की सदा सेवा करना, जिन प्रतिमाओं और जिन मन्दिरों का निर्माण कराना, जिन प्रतिमाओं की महान् अभ्युदय को सिद्ध करने वाली प्रतिष्ठा कराना, जिनेन्द्र प्रतिमाओं का महोत्सव के साथ अभिषेक करना, अनुप्रेक्षाओं आदि का चिन्तन करना, तप के लिए समीचीन पुरुषार्थ करना, अन्य जीवों का उपकार करना तथा मनुष्यों को धर्म आदि का उपदेश देना इन कार्यों से तथा रत्नत्रय आदि भावों से, श्री जिनेन्द्रदेव के स्मरण से एवं निर्ग्रन्थ साधुओं की भक्ति करने से ''भव्य जीव आश्चर्यकारी पुण्य को प्राप्त करते हैं''।
धर्म
उत्तम जेल- संसार में सबसे उत्तम जेल ब्रिटेन में है, फ्रांस का एक व्यक्ति उसको देखने गया, प्रत्येक कमरे में रेडियो, टी-वी, टेलीफोन, फ्रिज, लाइब्रेरी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जेल अधिकारी ने आगन्तुक से राय माँगी, उस व्यक्ति ने हँसकर कहा सब सुविधाओं के उपरान्त भी बन्धन तो बन्धन ही है, कैदी को सजा तो पूरी करना ही होगी, इसी प्रकार सांसारिक विषयों का बन्धन है।
अनासक्ति
नियम का भङ्ग करने से और देव-शास्त्र-गुरु की आज्ञा का लोप करने से महापाप का बन्ध होता है।
कर्म
आत्मा रुपी राम से मिलने के लिए पाप रुपी रावण का त्याग जरूरी है।
कर्म
विपत्तियाँ उड़ती हुयी आती हैं और वापस पैदल जाती हैं।
कर्म
कुत्ते के भाग्य में रोटी के साथ सब्जी नहीं होती है।
कर्म
लगती है तकदीर को जब ठोकर गम्भीर। राजा फिरता रङ्क बन रानी भरती नीर।।
कर्म
बढ़े पाप से पाप ही, यह उक्ति ध्रुव सत्य। पाप बड़ा है आग से, चिन्तन हो बुध नित्य।।
कर्म
मरघट में जाकर जगे, हर मन में वैराग्य। हर नाते को फूँक दे, वह मरघट की आग।।
अनासक्ति
विपदाओं के दुःख से, यदि चाहो निज त्राण। हानि अन्य की छोड़कर, करो स्व-पर कल्याण।।
अहिंसा
जब तक तेरे पुण्य का बीता नहीं करार। तब तक तुझ को माफ है औगुण करो हजार।।
कर्म
कर्मों की गति मन क्या जानें, सब को नाच नचावें। अपने अपने कर्मों का फल तीर्थंङ्कर भी पावें।।
कर्म