कोई मुनि यदि मरण काल में एक बार भी अरहन्तों को नमस्कार करता है, तो वह संसार का नाश करता है, जैसे अकेला सूर्य अन्धकार का नाश करता है। णमोकार 0 – भेजें
'मृत्यु' मित्र है, उपकारी है, शरीर रूपी पिञ्जरे से छुड़ाने वाली है, इसके विना हम अपने पुरुषार्थ का फल नहीं पा सकते हैं एवं समाधि के समय आत्मविश्वास कार्यकारी होता है। समाधि 0 – भेजें
पिता का मरण न बिगड़ जाय- अतः प्रेम का अभिनय किया जाय- पति-पत्नी में बहुत दिन से विवाद चल रहा था, इस कारण वे अलग-अलग रहते थे, कुछ दिनों में तलाक होने ही वाला था। एक दिन पत्नी के पिताजी का पत्र आया कि 'बेटा अब हम काशी जाकर सन्यास मरण करना चाहते हैं, इसके पहले हमारी इच्छा है कि कुछ दिन तुम्हारे पास रह लें और देख लें कि तुम सुख से रहती हो, तो हमारा सन्यास मरण अच्छे से हो जायेगा', पत्नी पति के पास आई और बोली 'पिताजी आ रहे हैं इसके बाद उन्हें काशी सन्यास मरण के लिए जाना है, कहीं उनका मरण न बिगड़ जाए इसलिए हम लोग कुछ दिन साथ-साथ रहते हैं', पिताजी आये पति-पत्नी प्रेम पूर्वक रहे, जब जाने लगे तो दोनों पिताजी को छोड़ने रेल्वे स्टेशन गये, जब लौटे तो पुनः अलग-अलग जाने लगे, तो पति ने कहा कि 'पिता का मरण न बिगड़ जाए इसके लिए हम लोग साथ-साथ रह सकते हैं, पर हम लोगों का मरण न बिगड़ जाए इसके लिए हम साथ-साथ नहीं रह सकते?' पत्नी ने कहा जब बनती नहीं तो साथ-साथ कैसे रहें, पति ने कहा कि हम प्रेम से रहने का अभिनय करेंगे तो धीरे-धीरे प्रेम हो ही जायेगा, फिर वे मरण बिगड़ने के डर से साथ-साथ रहने लगे। परिवार 0 – भेजें
दुनिया को जीता-किन्तु मौत से हार गए- जिनके शरीर में नाखून की खरोंच तक नहीं थी, जिन्होंने अनेक राजाओं को जीता था, जो तीन खण्ड के अधिपति थे, जिनके पास सात रत्न थे, एक-एक रत्न की हजार-हजार देव सेवा करते थे, तो भी मृत्यु को नहीं जीत सके, ऐसे लक्ष्मण चाचा की मौत देखकर लव-कुश को वैराग्य हो गया, पिता बलभद्र श्री रामचन्द्रजी को नमस्कार किया और दीक्षा के लिए वन की ओर चले गये। समाधि 0 – भेजें