Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 420

शराबियों ने खेई नाव।

9 सूत्र

उपसर्ग में अनेक मुनियों ने सल्लेखना ली, गजकुमार, सुकुमाल आदि बड़े समाधि मरण पाठ से देखें।
समाधि
दुर्भिक्ष- भद्रबाहु स्वामी आदि चौबीस हजार मुनियों को दक्षिण में जाना पड़ा था।
समाधि
पाँच प्रकार का मरण- नौ केवल लब्धि वाले केवली का पण्डितपण्डित मरण होता है, छठवें आदि गुणस्थान वाले मुनि का पण्डित मरण होता है, देशव्रती का बाल पण्डित मरण होता है, चौथे गुणस्थान वाले सम्यग्दृष्टि का बाल मरण होता है, मिथ्यादृष्टि जीवों का बालबाल मरण होता है।
समाधि
पण्डित मरण के तीन भेद हैं-1.भक्त प्रत्याख्यान मरण- बारह वर्ष तक अपने शरीर की सेवा स्वयं कर सकते हैं एवं पर से करा सकते हैं, 2.इङ्गिनीमरण- स्वयं की सेवा स्वयं करते हैं दूसरों से नहीं कराते हैं, 3.प्रायोपगमन मरण- न स्वयं की सेवा स्वयं करते हैं न पर से सेवा करवाते हैं।
समाधि
शास्त्रोक्त विधि से आहार का त्याग कर मरण करना भक्त प्रत्याख्यान कहलाता है।
समाधि
बारह वर्ष की सल्लेखना- क्षपक प्रथम के चार वर्षों में काय क्लेश तप करता है, आगे चार वर्षों में षट् रसों का त्याग करता हुआ शरीर कृश करता है, आगे दो वर्ष काँजी का भोजन, स्वाद रहित भोजन करता है, आगे एक वर्ष आचाम्ल भोजन, आगे छह माह मध्यम तप से, अन्तिम छह माह उत्कृष्ट तप करता है।
समाधि
किसी सड़क से गुजरती अर्थी देखकर भगवान् को और अपनी मृत्यु को याद रखना और दूसरों पर किये उपकार को एवं दूसरों ने की तुम्हारी बुराई को भुला देना।
समाधि
अर्थी को देखकर ये मत कहना कि बेचारा चल बसा, किन्तु यह सोचना कि एक दिन हमारी अर्थी भी इसी रास्ते से गुजर जायेगी, लोग सड़क के दोनों ओर खड़े देखते रह जायेंगे, दूसरों की मौत अपने लिये चुनौती है।
समाधि
शराबियों ने खेई नाव-बढ़ी नहीं एक पाँव- शराबियों ने रातभर नाव चलाई, रस्सा खोला नहीं इसलिए वहीं के वहीं रहे, इसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी रस्सा नहीं खोला एवं समाधि मरण नहीं किया इसलिए संसार में ही रुल रहे हैं।
समाधि