अहिंसा के 'अ' को हटाकर, सत्य के आगे जोड़ दिया, अचौर्य के अ' को ब्रम्हचर्य में जोड़ दिया, अपरिग्रह के अ' का लोप कर दिया और संसारी प्राणी पाँचों पापों में लग गये हैं। धर्म 0 – भेजें
भील से भगवान् और मारीच से महावीर- जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के मधु नामक वन में 'पुरूरवा' नामक भीलों का राजा हुआ, उसकी कलिका नाम की स्त्री थी। उसी वन में सागरसेन मुनि ध्यान मग्न थे। भील ने उनको मारना चाहा। स्त्री ने रोका, भील ने प्रभावित होकर मुनि से मद्यादि का त्याग किया। भील मरकर सौधर्म स्वर्ग में उत्पन्न हुआ, स्वर्ग से अयोध्या में भरत चक्रवर्ती की रानी अनन्तमति से ज्येष्ठ पुत्र मारीच हुआ। भगवान् आदिनाथ के साथ दीक्षित हुआ, फिर भ्रष्ट होकर परिव्राजक बनकर स्वर्ग गया, वहाँ से आकर करीब पाँच भव तक परिव्राजक होता रहा और स्वर्ग जाता रहा। उसके बाद असंख्यात भव तक त्रस-स्थावरों में भटककर ब्राह्मण हुआ, फिर परिव्राजक होकर पाँचवे स्वर्ग गया। सुरम्या देश के पौदनपुर में त्रिपृष्ठनारायण हुआ, वहाँ से मरकर सात वे नरक गया, वहाँ से सिंह बनकर प्रथम नरक गया, वहाँ से निकल कर फिर सिंह हुआ। अजितञ्जय, अरिञ्जय नामक रिद्धिधारी मुनियों के उपदेश से सम्यक्त्व प्राप्त किया, 'दस' भव बाद में तीर्थंङ्कर होंगे 'ऐसा श्रीधर तीर्थंङ्कर से मैंने सुना है'। मुनिराज ने शेर से कहा, शेर ने श्रावक के व्रत लिये और सन्यास पूर्वक मरणकर, पहले स्वर्ग में सिंहकेतु नामक देव हुआ, चौथे भव में धातकी खण्ड की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा सुमित्र और मनोरमा रानी के प्रियमित्र नाम का चक्रवर्ती हुआ। दो हजार राजाओं के साथ दीक्षित हो बारहवे स्वर्ग गया, छत्रपुर में नन्दिवर्धन राजा के नन्द नामक पुत्र हुआ। सोलह कारण भावना भाकर तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया, फिर सोलहवें स्वर्ग गया, भरत क्षेत्र में विदेह देश के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ की प्रियकारिणी (त्रिशला) रानी ने सोलह स्वप्न देखे। फल पूँछा, गर्भकल्याणक, रत्नवृष्टि, नगरी रचना, आश्विन शुक्ल षष्ठी को, छप्पन कुमारी देवियों ने आकर सेवा की। कर्म 0 – भेजें
कल्पवासी के यहाँ घण्टा, ज्योतिष देव के सिंहनाद, भवनवासी देव के यहाँ शङ्खनाद, व्यन्तरों के यहाँ अनहद बाजे बजने लगे। जन्म कल्याणक के समय सौधर्मेन्द्र एक लाख योजन के ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर आता है। इन्द्र हजार हाथ, हजार पैर बनाकर ताण्डव नृत्य करता है एवं सुमेरूपर्वत पर आठ योजन गहरे, चार योजन चौड़े, एक योजन मुख वाले एक हजार आठ कलशों द्वारा क्षीरसागर के जल से अभिषेक करता है, बालक्रीडा के लिए देवों को नियुक्त करता है। इन्द्र ने जन्म के समय वीर और वर्धमान नाम रखे, सञ्जय-विजय मुनि का सन्देह दूर हुआ तो सन्मति नाम रखा, सङ्गम देव ने सर्प बनकर परीक्षा ली निर्भय रहे तो महावीर नाम रखा। भोजन-वस्त्र, वाहन सभी स्वर्ग से आते थे, तीर्थंङ्कर सत्ताईस लड़ी का हार पहनते हैं, जो चक्रवर्ती की सारी सम्पदा से भी अधिक कीमती होता है। आठ वर्ष में अप्रत्याख्यानावरण कषाय का क्षयोपशम हो जाता है जिससे वे देशव्रती हो जाते हैं, माँ ने आग्रह किया पुत्रवधु को देखना है, वीर ने कहा मुक्ति वधु का वरण करना है। मित्रों से पिता ने कहा वर्धमान नीचे है, माँ ने कहा ऊपर हैं, तब वीर ने बच्चों को अनेकान्त से समझाया कि बीच में होने से पिता की अपेक्षा नीचे माँ की अपेक्षा ऊपर है। तीस वर्ष में वैराग्य हो गया, लौकान्तिक देवों ने आकर वैराग्य की अनुमोदना की। चन्द्रप्रभ पालकी पर आरूढ़ हो षण्डवन में चले गये, एक बार उज्जयिनी के श्मशान में प्रतिमा योग धारण किया, तब महादेव रूद्र के द्वारा घोर उपसर्ग होने पर भी अचल रहे, तब अतिवीर नाम रखा गया था। राजा चेटक की बेटी 'चन्दना' (महावीर की छोटी मौसी) के यहाँ आहार हुआ, पञ्चाश्चर्य हुए, बारह वर्ष घोर तप कर अन्त में जृम्भिका ग्राम में ऋजुकूला नदी के तट पर वैशाख शुक्ला दशमी को केवलज्ञान हुआ। धर्म 0 – भेजें
छियासठ दिन तक गणधर के अभाव में देशना नहीं हुयी, भगवान् महावीर को केवलज्ञान होने के पैंसठ दिन बाद, आज गौतम गणधर ने वीर प्रभु का शिष्यत्व स्वीकार किया था, इसलिए वीर शासन जयन्ती पर्व महावीर प्रभु की देशना से प्रारम्भ हुआ। धर्म 0 – भेजें