Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 280

राजा भोज- पं. के दाता।

6 सूत्र

मन में नवधा भक्ति लेकर, तू जो दान करेगा। ऊपर वाला तेरा खजाना, रातों रात भरेगा।। जञ्जीरों में बँधी चन्दना, दान नहीं बँध पाये, इक्षु रस देकर श्रेयाँस भी दान तीर्थ कहलाये, अञ्जुलि भर देने वाले, दरिया (समुद्र) भरके मिलेगा।। ऊपरवाला।। पुण्य कोश तेरा रिक्त हो रहा, कुछ तो सञ्चय कर ले, नादानी को छोड़ रे मानी, दान को अक्षय करले। पद रज श्री चरणों की ले ले, शिवपद तुझको मिलेगा।। ऊपरवाला।। जिसने दिया उसी ने पाया, जो जोड़े सो छोड़े, खाता-वही सही रख पगले, कलम काहे को तोड़े, कैसे मिलेगा वक्त पड़े जब, जमा ही कुछ न करेगा।। ऊपरवाला।।
दान
गरीब का बेटा बीमार हो गया, पैसा पास में नहीं था, कर्जा करके पैसा लगाया, पच्चीस रुपये शुल्क थी, डॉ. को लाया तब तक बेटा मर गया, डॉ. को पच्चीस रुपये दिये उसने लेने से मना कर दिया, डॉ. ने तीन रुपये रिक्शे वाले को दिये उसने भी मना कर दिया यह भी त्याग है।
अनासक्ति
पूरी दुनिया को आहार कराने का पुण्य एक तरफ और एक मुनि को आहार कराने का पुण्य एक तरफ।
दान
त्याग धर्म वहाँ होता है जहाँ त्यागने के लिए कुछ नहीं बचता है।
अनासक्ति
हजार मिथ्यादृष्टि के बराबर एक जैनी, हजार जैनी के बराबर एक सम्यग्दृष्टि, हजार सम्यग्दृष्टि के बराबर एक व्रती ब्रह्मचारी, हजार व्रती ब्रह्मचारी के बराबर एक क्षुल्लक जी, हजार क्षुल्लक जी के बराबर एक आर्यिका, हजार आर्यिका के बराबर एक मुनि, हजार मुनियों के बराबर एक ऋद्धिधारी मुनि, हजार ऋद्धिधारी मुनियों के बराबर एक तीर्थंङ्कर को आहार देने में उत्तरोत्तर ज्यादा पुण्य होता है।
दान
राजा भोज बहुत दानी थे, मन्त्रियों को चिन्ता हुई कि राज्य का सञ्चालन कैसे होगा, अतः उन्होंने राजा से कहा, 'आपदार्थे धनं रक्षेत्' आपत्ति काल के लिए धन की रक्षा करना चाहिए, राजा भोज ने कहा, 'श्रीमतां कुत आपदा' भाग्यवानों को विपत्ति कहाँ से आ सकती है, मन्त्रियों ने कहा, 'दैवात् क्व चित् समायाति' दुर्भाग्य से कहीं से आ गयी तो, राजा ने कहा, 'सञ्चितोऽपि विनश्यति' पाप के उदय से सञ्चित धन भी नष्ट हो जाता है।
दान