Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 269

अनङ्गसरा से विशल्या।

10 सूत्र

पानी से वाणी बने, मन को रचता अन्न। खाना पीना शुद्ध यदि, आतम सदा प्रसन्न॥
आहार
सप्त धातुओं से भरा यह शरीर तीर्थंङ्कर मुनियों को आहार देने का पात्र है, देवों का शरीर नहीं।
दान
अभय दान- मनुष्य यदि अभयदान देने वाला है तो अन्य दान हो या न हो, क्योंकि अभयदान ही सब दानों में उत्तम दान है।
अहिंसा
जिस प्रकार तप के विना लोगों का शरीर व्यर्थ है, उसी प्रकार अभय दान के विना शेष दान व्यर्थ हैं।
अहिंसा
जो अभयदान देता है उसी ने समस्त श्रुत पढ़ा है, उसी ने परम तप तपा है और उसी ने समस्त दान दिए हैं।
अहिंसा
अभयदान से क्षणभर में विद्वानों से प्रशंसनीय एवं आपत्ति से रहित तीर्थंङ्कर व चक्रवर्ती की सम्पदाएँ प्राप्त की जाती हैं।
अहिंसा
''हजार जिह्वा वाले किसी भी व्यक्ति के द्वारा कल्पकाल तक अभयदान का फल नहीं कहा जा सकता है।''
अहिंसा
आर्यिका, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका तथा ब्रह्मचारी को वस्त्र देने से उज्ज्वल वस्त्र तथा शुक्ल ध्यान की प्राप्ति होती है।
दान
अनङ्गसरा से विशल्या- वज्रनाभि चक्रवर्ती की बेटी अनङ्गसरा को एक विद्याधर हरण करके ले गया, पत्नि के भय से जङ्गल में छोड़ गया, अनङ्गसरा तीन हजार वर्ष तक जङ्गल में रही, स्थान का परिमाण कर सल्लेखना ले ली थी, एक अजगर ने उसको निगल लिया, तभी पिता को मालूम हुआ, तब वे जङ्गल में लेने गये, सर्प को मारने की सोची, बेटी ने रोका और अभय दान दिलाया, जिसके फल से विशल्या हुयी, उसके स्नान का पानी औषधि के समान था, जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी तो विशल्या के आते ही वह निकल कर भाग गयी थी।
अहिंसा
धोबी और नाई दोनों मित्र थे, दोनों ने मिलकर धर्मशाला बनवाई धोबी ने लाकर मुनि महाराज को ठहरा दिया, नाई उन्हें भगाने लगा, दोनों आपस में लड़कर मरे धोबी सूकर एवं नाई शेर बना, मुनि महाराज गुफा में ध्यान कर रहे थे, शेर मुनि महाराज को खाना चाहता था एवं सूकर बचाना चाहता था, दोनों आपस में लड़कर के मरे सूकर अभय दान के प्रभाव से स्वर्ग गया, और शेर मारने के भाव से नरक गया।
अहिंसा