सत्याणुव्रत- स्थूल झूठ का त्याग, सत्यमहाव्रत- स्थूल व सूक्ष्म दोनों झूठ का त्याग, भाषासमिति- हित–मित–प्रिय वचन जिसमें बोले जाते हैं उसे भाषा समिति कहते हैं, 'जग सुहित कर सब अहित हर श्रुति सुखद सब संशय हरें'। सत्य 0 – भेजें
शान्ति है अभिप्राय जिनका ऐसे भगवान के निर्दोष वचन जितने शीतल होते हैं, उतना शीतल न चन्द्रमा होता है, न चन्दन, न गङ्गा का जल और न ही स्फटिक का हार शीतल होता है। वाणी 0 – भेजें
भाषण जिव्हा की खुजलाहट और बौद्धिक व्यापार है और प्रवचन जीवन का निचोड़ है, प्रवचन में विद्वत्ता नहीं हार्दिकता होती है। वाणी 0 – भेजें
व्यक्ति के होते हुए भी मना करना यह प्रथम असत्य है, (जैसे देवदत्त के होते हुए भी मना करना कि यहाँ नहीं है।) वस्तु के नहीं होते हुए भी हाँ कहना दूसरा असत्य है, (जैसे घड़े के नहीं होते हुए भी हाँ कहना।) वस्तु का अन्यथा कथन करना ये तीसरा असत्य है, (जैसे घोड़े को गधा कहना।) सत्य 0 – भेजें
चुगली, निन्दा, हास्य, कठोर, झूठ, प्रलापरूप तथा और भी शास्त्र विरुद्ध वचन निन्द्य कहलाते हैं। हास्यगर्भ– एक अप्रैल को लोग झूठ बोलकर हँसी उड़ाते हैं अथवा जिन वचनों से किसी की हँसी उड़ाई जा रही हो। कर्कश– पवनञ्जय ने अञ्जना से कहा मरजा, मुख न दिखा ये कर्कश वचन कहलाते हैं। प्रलपित– असीमित बोलना। उत्सूत्र-बच्चों को गाली देना, आगम विरुद्ध बोलना। सावद्य– नाक कान आदि के छेदन के वचन कहना। मारण– बच्चों आदि को मारना। वाणिज्य– पाप वर्धक व्यापार के वचन बोलना, जैसे साबुन, माचिस आदि के बेचने को कहना। वाणी 0 – भेजें