आचार्य शान्तिसागर जी पर उपसर्ग- एक बार धौलपुर नगर में आचार्य श्री का सङ्घ आया तो आचार्य श्री को भावी दुर्घटना का पूर्वाभास हो गया था, अतः उन्होंने पूरे सङ्घ को अन्दर सामायिक करने का आदेश दिया, उपसर्ग करने वाले आये और बाहर ही घेर कर बैठ गये, जैन बन्धुओं ने राजा से शिकायत की तो राजा ने दुष्टों को गिरफ्तार करके कहा की आचार्य महाराज जो सजा कहेंगे वही सजा इन्हें दी जाएगी, महाराज ने तीन बार वचन लिया कि 'जो हम कहेंगे वही सजा दोगे'? राजा ने कहा कि जो आप कहेंगे वही सजा दी जाएगी, तब आचार्य श्री ने कहा कि इन्हें छोड़ दो, तब वे उपसर्ग करने वाले महाराज के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगे, महाराज ने कहा हम अपराधी को नहीं अपराध को समाप्त करते हैं, अपराधियों ने प्रण किया कि ऐसी गलती अब हम कभी नहीं करेंगे। क्षमा 0 – भेजें
दुर्जन, क्रूर, कुमार्ग रतों पर-दुर्जन- जयद्रथ ने कषाय के वश पाण्डवों को लोह मयी गर्म आभूषण पहनाये पर पाण्डवों ने क्षमा धारण की और तीन पाण्डव मोक्ष पधारे और दो सर्वार्थसिद्धि गये। क्रूर- स्यालनी ने सुकोशल मुनि को खाया मुनि ने क्षमा धारण की और सर्वार्थसिद्धि गये। कुमार्गरत- भगवान् आदिनाथ के समय चार हजार मुनि भ्रष्ट हो गये, पर आदिनाथ भगवान् ने मौन नहीं तोड़ा और समता रस के स्वादी बने रहे। क्षमा 0 – भेजें
झगड़े का कारण- अपने बेटे को बड़ा गन्ना, भाई के बेटे को छोटा गन्ना देने से भाई-भाई में झगड़ा प्रारम्भ हो जाता है। परिवार 0 – भेजें
क्रोधी व्यक्ति कमठ के मठ में पहुँचता है और बैर का विकास करता है, संसार की लम्बी यात्रा करता है और क्षमावान पार्श्वनाथ के पार्श्व में विराजता है चिर, विश्राम और अपूर्व आनन्द पाता है। क्षमा 0 – भेजें