Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 151

प्रेम पूर्ण आहार-सबसे।

5 सूत्र

रत्नत्रय की आराधना से निरन्तर आत्मा की प्रभावना करनी चाहिये एवं दान, तप, जिनपूजा और विद्या के अतिशय से जिनधर्म की प्रभावना करनी चाहिये।
धर्म
नाम की प्रभावना चाहने वाला आत्महित व धर्म की प्रभावना भी नहीं करता है।
धर्म
प्रभावक लोग धर्म के निर्मूल विध्वंस को सहन नहीं करते हैं, क्योंकि विना पाप के धर्म की प्रभावना सम्भव नहीं है।
धर्म
सेठ हरजस राय दिल्ली वालों ने विधान के बाद पूरी समाज को लड्डू बँटवाये, एक गरीब ने लड्डू नहीं लिये, मुनीम ने सेठ को खबर दी, कि गरीब ने कहा है कि हम सेठ को खिला नहीं सकते तो उनकी भेंट कैसे लेवें? सेठ जी दूसरे दिन बग्घी पर सवार होकर उसकी दुकान की ओर गये, वह हाथ ठेला पर चना-मूंगफली बेचता था, सेठ ने उसकी बरनी में से चना-मूंगफली निकाल कर खा लिये, पानी पिया और कहा भैया अब हमारी भेंट स्वीकार करो, हमने तुम्हारे यहाँ खा लिया, यह उदारता कहलाती है।
विनम्रता
प्रेम पूर्ण आहार-सबसे बड़ा उपहार- बनारस में महावीर जयन्ति के अवसर पर श्री जी की शोभा यात्रा निकलती थी किंतु कुछ वर्षों से विरोधी तत्त्वों के कारण रथ नहीं निकाल सकते थे, महावीर जयन्ती के अवसर पर पण्डित जगनमोहनलाल जी कटनी वालों को बुलाया, उनके कहने से सबसे पहले विरोधियों को प्रीति भोज दिया गया, चल समारोह के कार्य उन्हीं को सौंप दिये, रथ निकाला गया, चौराहे पर भोजक ने आलाप भरकर राग गाया 'दौलत पक्षपात तज देखो, साँचो देव कौन है इनमें' सुनते ही सबकी दुकानें खुल गयीं थी।
संगति