धर्मात्मा में, व्रतों में, स्वाध्याय में, जिन पूजन में वात्सल्य करो, वात्सल्य गुण के प्रभाव से ही समस्त द्वादशाङ्ग विद्या सिद्ध होती है, सिद्धान्त सूत्र (ज्ञान) में और सिद्धान्त के उपदेशक उपाध्याय (ज्ञानी) में सच्ची भक्ति के प्रभाव से ज्ञानावरण कर्म का रस सूख जाता है जिससे समस्त विद्याएं सिद्ध होती हैं, वात्सल्य गुण के धारक को देव भी नमस्कार करते हैं और वात्सल्य से ही अठारह प्रकार की बुद्धि ऋद्धि, दो प्रकार की आकाश गामिनी ऋद्धि, अनेक प्रकार की चारण ऋद्धि, अनेक प्रकार की विक्रिया ऋद्धि, तीन प्रकार की बल ऋद्धि, सात प्रकार की तप ऋद्धि, छ: प्रकार की रस ऋद्धि, आठ प्रकार की औषध ऋद्धि, दो प्रकार की क्षेत्र ऋद्धि इत्यादि अनेक ऋद्धियाँ प्रकट होती हैं। भक्ति 0 – भेजें
जिसको जिनवाणी में वात्सल्य नहीं है, विनय नहीं है, उसको यथावत् अर्थ का ज्ञान नहीं होता, विपरीत अर्थ ग्रहण करता है, मनुष्य के जीवन का आभूषण वात्सल्य है, देव-शास्त्र-गुरू और दया धर्म में वात्सल्य निर्वाण का कारण है। भक्ति 0 – भेजें
चार मिले चौसठ खिले बीस रहे कर जोड़। ज्ञानी ऐसे मिलन में पुलकित सात करोड़।। एक शरीर में अस्सी लाख करोड़ रोम होते हैं। संगति 0 – भेजें
जो जुदा करे उस कैंची को भूमि पर पटकी जाती है। जो दो को एक करे सुईयाँ पगड़ी में रक्खी जाती है।। संगति 0 – भेजें