Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 48

बुद्धि, लज्जा, हिम्मत, तन्दुरुस्ती का निवास कहाँ।

2 सूत्र

उताबला सो बाबला- एक दिन कड़ाके की ठण्ड थी, उस दिन रानी चेलना का हाथ रजाई के बाहर रह गया, ठण्ड के कारण हाथ अकड़ गया, रानी की नींद खुली और हाथ की दशा देखकर मुँह से निकल गया, उनका क्या होगा? राजा ने आवाज सुनी लेकिन अभिप्राय नहीं समझ सका, उसने सोचा चेलना का सम्बन्ध किसी और से भी है, इसीलिए उसको याद कर रही है, राजा क्रोध में तमतमा उठा, म्यान से तलवार खींचकर रानी को मारने तैयार हो गया, उसको सामने एक पङ्क्ति लिखी दिखी 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः...' अर्थात् अचानक कोई काम नहीं करना चाहिए, क्योंकि 'अविवेक' आपत्तियों का बहुत बड़ा स्थान है, जो सोच विचार कर काम करते हैं, उन्हें गुणों की लोभी सम्पत्तियाँ स्वयं प्राप्त हो जाती हैं, यह पढ़कर राजा सहम गया, सोचा मारने के पहले पूँछ लें ये किसको याद करती है? राजा ने चेलना को जगाया और पूँछा तुम किसको याद कर रही हो? चेलना ने कहा स्वामिन्! कल अपन लोगों ने जङ्गल में नदी किनारे विराजमान मुनिको देखा था, वे ऐसी ठण्ड में वहाँ रहते हैं, मैं तो महल के अन्दर रजाई में हूँ, आज रजाई के बाहर हाथ रहा तो ये दशा हो गयी, तब मैंने सोचा उन मुनि का क्या होगा? राजा ने कहा ओहो! इसको स्वप्न में भी साधु दिखाई देते हैं, विना पूँछे तलवार चला देता तो मैं अपनी प्राण प्रिया को खो देता।
विवेक
बुद्धि, लज्जा, हिम्मत, तन्दुरुस्ती का निवास कहाँ- एक यात्री को यात्रा में क्रमशः चार स्त्रियाँ मिलीं, सबसे पहले खूबसूरत स्त्री मिली, यात्री ने पूछा! तुम कौन हो और कहाँ रहती हो? स्त्री ने जबाव दिया मैं बुद्धि हूँ और मनुष्य के दिमाग में रहती हूँ। दूसरी ने कहा मेरा नाम लज्जा है, और मैं मनुष्य की आँखों में रहती हूँ, शालीनता और सद्व्यवहार मेरा स्वभाव है। तीसरी स्त्री ने कहा मेरा नाम हिम्मत है, और मैं मनुष्य के हृदय में रहती हूँ। चौथी स्त्री ने कहा मेरा नाम तन्दुरुस्ती है और मैं मनुष्य के पेट में रहती हूँ। वह व्यक्ति बढ़ा और उसे चार पुरूष मिले, पहले पुरूष ने कहा मेरा नाम क्रोध है और मैं मनुष्य के दिमाग में रहता हूँ। यात्री ने कहा वहाँ बुद्धि रहती है तुम कैसे रह सकते हो? क्रोध ने कहा जब तक मैं नहीं आता हूँ तभी तक बुद्धि रहती है, और मेरे आते ही बुद्धि वहाँ से भाग खड़ी होती है। दूसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम लोभ है और मैं पुरूष की आखों में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ लज्जा रहती है, लोभ ने कहा कुछ धन सम्पत्ति रखकर देखिये कि लज्जा किस प्रकार लोभी की आँखों से भागती है। तीसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम भय है, और मैं लोगों के हृदय में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ हिम्मत रहती है तुम कैसे रह सकते हो? भय ने कहा लोग अन्तःकरण की आवाज नहीं सुनते और गलत कार्य करते रहते हैं और भयभीत भी रहते हैं, परिणाम स्वरूप हिम्मत वहाँ से चली जाती है, चौथे पुरूष ने कहा मेरा नाम रोग है और मैं मनुष्य के पेट में रहता हूँ। यात्री ने टोका लेकिन वहाँ तन्दुरुस्ती रहती है, पुरूष ने कहा बिल्कुल गलत, जब तक लोग सात्विक, सुपाच्य आहार की जगह गरिष्ठ भोजन, मांस, मदिरा, तम्बाकू आदि का सेवन करते रहेंगें और नियमित जीवन नहीं जियेंगे तब तक तन्दुरुस्ती वहाँ रह ही नहीं सकती, वहाँ फिर मैं ही रह सकता हूँ, यात्री स्त्री-पुरूषों के रूप में मिले सत्य के प्रकाश में आगे बढ़ गया।
ज्ञान