Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 391

राजभोग-वैराग्ययोग।

3 सूत्र

सर्व सिद्धिदायक सिद्धचक्र का व्रत करो और प्राण नाश होने पर भी व्रतों का त्याग मत करो, सिद्धचक्र की विधि-पञ्चरत्नों से मण्डल माँड़कर चारों कोणों में प्रतिमाएं विराजमान कर अष्टद्रव्य से भक्ति करें, बारह वर्षों तक तीनों कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ माह के शुक्लपक्ष में सिद्धचक्र का स्मरण करें, श्रावक श्राविकाओं को बड़ी विनय पूर्वक भोजन करावें, ऐसा करने से स्वर्ग/मोक्ष की सम्पदा प्राप्त होती है। इसी व्रत के माहात्म्य से अनन्त सिद्ध हुये हैं। नन्दीश्वर की महिमा तीनों लोकों मे अपूर्व है।
भक्ति
अर्थात् यदि राजा धार्मिक होता है तो प्रजा भी धार्मिक होती है और यदि राजा पापी होता है तो प्रजा भी पापी होती है, सम होने पर सम होती है, लोग तो अनुशरण करते हैं जैसा राजा होता है वैसी प्रजा होती है।
चरित्र
एक आँख बराबर स्थान में छियानवे रोग हो सकते हैं, पूरे शरीर में पाँच करोड़ अड़सठ लाख निन्यानवे हजार पाँच सौ चौरासी रोग हो सकते हैं।
स्वास्थ्य