मैनासुन्दरी की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करना, 2.चार प्रकार का दान, 3.पूजा आदि अपने षडावश्यकों का पालन करना, 4.धीरे बोलो-शान्ति मिलेगी, 5.भक्ति करो-मुक्ति मिलेगी, 6.सेवा करो-शक्ति मिलेगी, 7.दान करो-सम्मान मिलेगा, 8.सन्तोष रखो-सुख मिलेगा, 9.सहन करो-साथ मिलेगा, 10.अहं छोड़ो चमन खिलेगा। चरित्र 0 – भेजें
माता की सीख- 1.पञ्चपरमेष्ठी ही मङ्गल एवं शरणाधार हैं, 2.सिद्धचक्र की आराधना करना, 3.तात्कालिक चमत्कार में नहीं फँसना, 4.स्त्रियाँ स्वभाव से चञ्चल होती हैं उनका सहसा विश्वास नहीं करना, 5.परदेश में ढोंगी, कपटी, मिथ्याचारी कौन है इसे समझकर विवेक से आत्मरक्षा करना, 6.परदेश में अत्यन्त सावधानी की जरूरत है, 7.परधन व परस्त्री पर भूलकर भी दृष्टिपात नहीं करना, 8.सप्त व्यसनों से सदैव दूर रहना, 9.जल, ठग, कञ्जूस, हठी, शस्त्रधारी, नेत्रहीन, नख सींग वाले पशु, वेश्या, रोगी, ऋणि, बन्दी, शत्रु, जुआँरी, चोर, झूठ बोलने वालों का विश्वास नहीं करना, इनके मिष्ट व्यवहार को गुड़ लपेटी तलवार समझना, 10.जटाधारी, मुण्डितशिर भस्मधारी, तान्त्रिक वनवासी, कुबड़ा, बोना, काना, छोटी गर्दन वाला, डाकिनी, शाकिनी, दूतों, दासियों का विश्वास नहीं करना, 11.धन प्राप्त होने पर अहङ्कार नहीं करना, 12.सबको माता बहिन तुल्य समझना, 13.स्थान, वन, नगर, राजकुल का विश्वास नहीं करना, 14.घोड़े से सात हाथ, सींग वाले पशु से पाँच हाथ, नारी से बीस हाथ, हाथी से साठ हाथ की दूरी बनाए रखना, क्रूर पशु का और चार्वाक् मत का विश्वास नहीं करना, 15.बोलना कम-विचारना ज्यादा, 16.बैठना कम-चलना ज्यादा, 17.लेना कम-देना ज्यादा, 18.उपदेश कम देना-आचरण ज्यादा करना, 19.आज्ञा कम देना-सेवा ज्यादा करना, 20.खेद कम करना-प्रसन्न ज्यादा रहना। विवेक 0 – भेजें
किसकी आँखों में क्या रहता है- 1.माँ की आँखों में ममता, 2.पिता की आँखों में फर्ज, 3.पत्नी की आँखों में कर्तव्य, 4.भाई की आँखों में प्यार, 5.बहिन की आँखों में दुलार, 6.अमीर की आँखों में अहङ्कार, 7.गरीब की आँखों में दीनता, 8.मित्र की आँखों में सहयोग, 9.दुश्मन की आँखों में बदला, 10.कामी की आँखों में वासना, 11.क्रोधी की आँखों में ललिमा, 12.मानी की आँखों में बड़प्पन, 13.लोभी की आँखों में स्वार्थ, 14.कपटी की आँखों में चंचलता, 15.ज्वाँरी की आँखों में धन, 16.मांसभक्षी की आँखों में क्रूरता, 17.सज्जन की आँखों में दया, 18.शिष्य की आँखों में आदर, 19.गुरु की आँखों में 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की भावना ही रहती है। विवेक 0 – भेजें
पञ्चनमस्कार मन्त्र का स्मरण कर जहाजों में फूँक मारी तो जहाज चल पड़े, जो क्षुद्र देव थे वे मन्त्र के प्रभाव से नष्ट हो गये। णमोकार 0 – भेजें
जिनालय के कपाट देव भी खोलने में समर्थ नहीं हैं फिर मनुष्यों की क्या बात है? श्रीपाल जी ने पञ्चनमस्कार का स्मरण कर कपाटों का स्पर्श किया और कपाट खुल गये। णमोकार 0 – भेजें