Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 368

लालटेन पर कपड़ा। आठ कर्मों का दृष्टांत।

14 सूत्र

पाँच अङ्क का कर्ज- 99999 रूपये का कर्ज है, मिथ्यात्व चला जाता है तो एक अङ्क हट जाता है तो नब्बे हजार का कर्ज उतर जाता है, 9999 का कर्ज रह जाता है, जो क्रमशः अविरति, प्रमाद, कषाय और योग के अभाव में उतरता है।
कर्म
लोहे में खिचने की शक्ति है, तांबा, पीतल आदि में नहीं इसलिए चुम्बक लोहे को खींचती है। इसी तरह योग चुम्बक है और कर्म, नौकर्म वर्गणा में खिचने की शक्ति है और कषाय सहित जीव कर्मों को खींचता है।
कर्म
कर्म का फल नोकर्म के विना नहीं मिलता, जैसे लीड और करण्ट के विना माइक आवाज नहीं करता, कर्म और नोकर्म का चेतन के साथ वैभाविक सम्बन्ध है।
कर्म
गरम लोहा पानी को बहुत जल्दी खींचता है, उसी प्रकार तीव्र कषाय से स्थिति, अनुभाग तीव्र होता है।
कर्म
उभयबन्ध और भावबन्ध-दूध और पानी की तरह आत्मा और कर्म का संश्लेष सम्बन्ध है, जीव और कर्म का उभयबन्ध कहलाता है। जीव में मिथ्यात्व आदि भाव होना भाव बंध है।
कर्म
स्थिति और अनुभाग का होना द्रव्यबन्ध है तथा कषाय और योग से भावबन्ध होता है।
कर्म
एकेन्द्रिय जीव की मिथ्यात्व की स्थिति एक सागर है और जघन्य स्थिति पल्य का संख्यातवां भाग कम एक सागर होती है।
कर्म
नोकर्म की स्थिति उपभोक्ता के अनुसार होती है, जैसे जिस नक्षत्र में कपड़े पहनना शुरू करोगे, उसके अनुसार कपड़े की स्थिति रहेगी।
कर्म
योगों से हुआ बन्ध तत्काल झड़ जाता है, कषाय से हुआ बन्ध करण परिणामों से झड़ाना पड़ता है।
कर्म
एकेन्द्रिय तेजकाय वायुकाय में उच्च गोत्र का बन्ध नहीं होता वहाँ उसकी उद्वेलना होती है।
कर्म
सातवें नरक का जीव सम्यक्त्व के काल में उच्च गोत्र का बन्ध करता है।
कर्म
प्रकृतिबन्ध को द्रव्य बन्ध, प्रदेशबन्ध को क्षेत्र बन्ध, स्थितिबन्ध को काल बन्ध, अनुभागबन्ध को भाव बन्ध कहते हैं।
कर्म
पानी की अपेक्षा अमृतधारा की शक्ति अधिक और प्रदेश कम होते हैं।
कर्म
लालटेन पर कपड़ा- प्रकाश को आवृत करना प्रकृति है, कपड़े की लम्बाई चौड़ाई प्रदेश है, कपड़ा कब तक पड़ा रहेगा स्थिति है, पतला-मोटा कपड़ा अनुभाग है।
कर्म