Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 331

पत्नी ने पति को पिताजी कहा। जब राम बनता हूँ। मैं आपका पुत्र हूँ।

5 सूत्र

बुढ़िया को तो हमने वहीं छोड़ दिया- एक बार ब्रह्मचारीजी यात्रा कर रहे थे, रास्ते में नदी पार करने लगे, तभी ब्रह्मचारीजी की दृष्टि एक बुढ़िया पर गयी जो असहाय थी, उसने कहा ! महात्माजी अपने साथ हमें भी नदी पार करा दो, नहीं तो रात भर यहीं रहना पड़ेगा, ब्रह्मचारीजी को दया आगयी, अपने कन्धे पर उसे बैठाकर नदी पार करा दिया, कुछ लोगों ने उनके गुरु से कहा, कि इन्होने स्त्री को छुआ है, ब्रह्मचारीजी ने कहा ! हम तो स्त्री को वहीं छोड़ आये, आप लोग तो यहाँ तक ले आये हैं।
ब्रह्मचर्य
वेष भूषा- इंस्पेक्टर की लड़की भड़कीले वस्त्रादि पहनकर निकल रही थी, एक लड़के ने छेड़ दिया, उसने अपने पिताजी को घटना की जानकारी दी, रिपोर्ट की गई। उस बच्चे को बन्दी बना लिया, केस चला, जज ने लड़के से पूँछा इसके साथ छेड़खानी की है? उसने कहा नहीं, यदि ये उसी वेषभूषा में आये तो मैं पहचान सकता हूँ, जज ने लड़की को उस दिन के वेष में बुलाया, लड़के ने कहा मैंने इसको वेश्या समझा था, इंस्पेक्टर शर्म से नतमस्तक हो गया, अतः हमारी वेषभूषा साधारण होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
बनारसी साड़ी- गणेश प्रसाद वर्णी जी के विद्यागुरू पण्डित ठाकुरदासजी की सर्विस बनारस में लग गयी थी, वे छः माह बाद जब घर आये, तो पत्नि के लिए पाँच रुपये की बनारसी साड़ी लेकर आये, जब पत्नि को दिखाई तो पण्डित जी ने सोचा कि पत्नि प्रसन्न होगी, लेकिन पत्नि उदासीन होकर कहती है कि जब मैं ये साधारण साड़ियाँ पहनती हूँ तब भी आप बनारस से यहाँ दौड़े आये, अब इस बनारसी साड़ी को पहनकर मैं किसको रिझाऊँ ? पण्डित जी चुप हो गये, उनकी पत्नी ने पाँच रुपये की साड़ी साढ़े चार रुपये में पड़ोसी को बेच दी, लेकिन उन्होंने वह भड़कीली साड़ी नहीं पहनी।
ब्रह्मचर्य
पत्नि ने पति को पिताजी कहा- पण्डित ठाकुरदास जी की पत्नि भोगों से उदासीन हो गयी, बार-बार कहती थी, कि अब ब्रह्मचर्य व्रत ले लेवें, लेकिन पण्डित जी टाल देते थे, एक दिन पण्डित जी की गोद में बैठकर बोलीं 'पिताजी अब मुझे क्षमा कर दो, मैं व्रत पालना चाहती हूँ', पण्डित जी ने आँखों में आँसु भरकर कहा बेटी आज से अपन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे, तुमने मुझे वह शिक्षा दे दी जो अनेक शास्त्र भी नहीं दे सके।
ब्रह्मचर्य
जब राम बनता हूँ- रावण और मन्दोदरी सीता को रिझाने में असफल रहे तो मन्दोदरी ने कहा तुम राम का रूप क्यों नहीं बना लेते, तब रावण ने कहा जब मैं राम का रूप बनाता हूँ तो सीता के साथ भोग भोगने का भाव समाप्त हो जाता है, वेश मात्र से भाव परिवर्तित हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य