Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 176

द्रोपती की क्षमा।

5 सूत्र

उद्दण्ड बालक पर क्षमा-एक सेठ ने पाठशाला खुलवाई, उसमें एक बालक बहुत उद्दण्ड था, प्रतिदिन विद्यालय में कुछ न कुछ तोड़-फोड़ करता रहता था, शिक्षक ने सेठ जी से कहा, कि मैं इस बालक को नहीं पढ़ाऊँगा, सेठजी उस बालक को घरले गये, वह ऊधम करता सेठजी शान्ति से सहन कर लेते, काँच, प्लास्टिक मिट्टी आदि के बर्तनों को तोड़ता सेठजी कुछ न कहते, एक दिन सेठजी की घड़ी फोड़ दी तब भी सेठजी ने कुछ नहीं कहा, अबकी बार बालक को स्वयं पश्चात्ताप हुआ सेठजी से क्षमा माँगी आगे चलकर वह बहुत बड़ा विद्वान बन गया था।
क्षमा
पण्डित टोडरमल जी की क्षमा- किसी शरारती ने पण्डितजी के पास एक पागल व्यक्ति लाकर खड़ा कर दिया और कहा कि ये आपके साढू भाई आये हैं, पण्डितजी उसे देखकर कुपित नहीं हुये बल्कि उन्होंने स्वीकार कर लिया, अपने पास रख लिया एक दिन उस व्यक्ति ने देखा कि पण्डितजी उसकी अच्छी सेवाकर रहे हैं वास्तव में ये इनके साढू हैं क्या ? पण्डितजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि हाँ, एक माँ की दो बेटियां थीं एक साता और दूसरी असाता उनमें से हमारी शादी साता से हो गई और इनकी शादी असाता से हो गई इसलिऐये हमारे साढू ही तो हैं।
क्षमा
अभी तक गरजती थी-पण्डित गोपालदास जी की धर्मपत्नी ने उनका अनेक बार अपमान किया किन्तु पं. जी ने समता नहीं त्यागी, एक रात्रि को पण्डितजी घर आये, पत्नी ने दरवाजे नहीं खोले, कुछ देर बाद गुस्से में उठी और जनवरी माह की ठण्ड में छत से ही एक घड़ा ठण्डा पानी पण्डितजी के ऊपर डाल दिया, पण्डितजी बोले, हे देवि अभी तक तो तू गरजती थी, पर बरसी आज ही है।
क्षमा
सर्प की क्षमा-एक सर्प ने मुनिराज से नियम ले लिया कि अब हम किसी को नहीं काटेगें, लोग उसको सताने लगे, वह महाराज के पास नियम वापिस करने गया तब महाराज ने कहा तुम्हे काटना छुड़ाया है फुड्ढारना नहीं।
क्षमा
द्रोपदि की क्षमा- महाभारत के समय द्रोपदि के पाँचों बेटों को अश्वत्थामा ने मार डाला द्रोपदि शोक सागर में मग्न थी तभी अर्जुन अश्वत्थामा को युद्ध से पकड़ कर द्रोपदि के सामने खड़े कर देते हैं, भीम बोले इसके टुकड़े-टुकड़े करके कौओं को खिला दो तब द्रोपदि ने कहा इसकी माँ को भी इतना ही कष्ट होगा जितना मुझे हो रहा है, इसलिए इसको छोड़ दो।
क्षमा