Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 117

चमारों की सभा। शूद्री के यहाँ जन्मे।

7 सूत्र

यह सम्यग्दर्शन का सबसे उत्कृष्ट अङ्ग है।
विवेक
स्वभाव से अपवित्र किन्तु रत्नत्रय से पवित्र शरीर में ‘गुणों में प्रीति के कारण’ ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग माना गया है।
विवेक
भूख, प्यास, ठण्डी, गर्मी आदि नाना भावों में एवं मल-मूत्र आदि द्रव्यों में ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग है।
विवेक
अपने गुणों की प्रशंसा और दूसरों के अवगुणों की निन्दा करना विचिकित्सा है, उससे जो रहित है वह निर्विचिकित्सा है।
विवेक
जो जीव दुर्भाग्य से दुःखी है, तीव्र असाता के उदय में घृणास्पद है, ऐसे जीवों से भी ग्लानि नहीं करना निर्विचिकित्सा अङ्ग है।
अहिंसा
मन में ऐसा भाव भी नहीं आना चाहिए कि मैं सम्पत्तियों का घर हूँ, ये विपत्तियों का घर है, ये हमारे जैसा नहीं हो सकता, किन्तु इससे विपरीत सोचें कि कर्मोदय से जितने भी त्रस-स्थावर जीव हैं, वे सब समान है, जैसे शूद्री के उदर से जन्मे दो बेटे एक विप्र के यहाँ पला, एक शूद्र के यहाँ पला, इस कारण उनमें जाति भ्रम हो गया, लेकिन वास्तव में दोनों शूद्र की सन्तान हैं, उसी प्रकार वेदनीय कर्म के दो भेद हैं एक सातावेदनीय एक असातावेदनीय।
अहिंसा
राजा जनक की सभा में अष्टावक्र ऋषि गये, लोग एक दम हँस पड़े तो अष्टावक्र ऋषि बोले लोग मेरे चमड़े के आठों टेढ़े अङ्गों को देखकर हँसते हैं, अतः ये राजा जनक की सभा नहीं चर्मदर्शकों की सभा है।
विवेक