Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 32

कंजूस

17 सूत्र

तीनों लोकों में जो दोष हैं वे लोभ से उत्पन्न हुए हैं व गुण लोभ के त्याग से प्राप्त हुए हैं।
संतोष
धन से धर्म और काम पुरुषार्थ करना चाहिए परन्तु स्त्रियाँ धर्म और काम से धन खरीदती हैं अतः उनकी इस बढ़ी हुई लोलुपता को धिक्कार है।
संतोष
इस जीव ने स्वाद के चक्कर में पूरा जीवन स्वाहा कर दिया है।
आहार
लोभ से ही क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से ही काम की प्रवृत्ति होती है और लोभ से माया, मोह, अभिमान, उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं।
संतोष
जिस व्यक्ति में लोभ है, उसे दूसरे अवगुण की क्या आवश्यकता है?
संतोष
यदि लोभ को हटाना चाहते हो तो तुम्हें पहले उसकी माँ विलासिता को हटाना होगा।
संतोष
जो किसी बात की लालसा नहीं रखता, उसको कोई दुःख नहीं होता परन्तु जो वस्तुओं के लिए मारा-मारा फिरता है, उस पर निरन्तर आपत्तियाँ आती रहती हैं।
संतोष
जुआ मत खेलो, भले ही उसमें जीत क्यों न होती हो; क्योंकि तुम्हारी जीत उस काँटे के मांस के समान है, जिसे मछली निगल जाती है।
चरित्र
मनुष्य को जितना अधम जुआ बनाता है उतना और कोई नहीं क्योंकि इससे उसकी कीर्ति, विद्वत्ता और सम्पत्ति; ये सब उसका साथ छोड़ देते हैं, उसका हृदय कुकर्म करने की प्रेरणा पाता है यहाँ तक कि खाने और कपड़े तक के लिए भीख माँगनी पड़ती है।
चरित्र
कंजूस का गढ़ा हुआ धन जमीन से तभी बाहर निकलता है जब वह स्वयं जमीन में गढ़ जाता है।
दान
कंजूस व्यक्ति के पास पूरी दुनिया की दौलत हो तब भी वह किस काम की है?
दान
कृपणता मनुष्य के मन व संकल्प को मलिन कर देती है।
दान
जिस तरह दानशीलता मनुष्य के दुर्गुणों को छिपा लेती है, उसी तरह कृपणता उसके सद्गुणों पर पर्दा डाल देती है।
दान
कंजूस आदमी के दुश्मन सब होते हैं, दोस्त कोई नहीं होता, हर व्यक्ति को उससे नफरत होती है।
दान
कृपण मनुष्य को उस वस्तु का वैसा ही अभाव है जो उसके पास है जैसा उस वस्तु का जो उसके पास नहीं है।
दान
दुःखी की तरह जीवन बिताना ताकि धनी रूप में मर सके यह निरा पागलपन है।
दान
कृपण व्यक्ति स्वयं को निर्धन दिखाते रहने से धनी हो जाता है और फिजूल खर्च मनुष्य स्वयं को धनी दिखाते रहने से निर्धन हो जाता है।
दान