Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 79

कर्मों कि गति।

4 सूत्र

तीन बालकों में होड़ लगी कि तुम हमको हँसा दो, तो मैं तुम्हारी सेवा करूँगा, उसको पचास तरह से हँसाया लेकिन वह नहीं हँसा, इसी तरह पुण्य-पाप को चुनौती दें, कि इनके आने पर हम हर्ष-विषाद नहीं करेंगे।
कर्म
नारियल में पानी- पुण्य की निशानी- जो होनहार है वह नारियल के भीतर पानी के समान होती ही है और जो जाने वाली है वह गज के द्वारा खाये हुये कैथ के दल के समान जाती ही है, अर्थात् जैसे नारियल में पानी अपने आप आ जाता है और हाथी के द्वारा खाये हुये कैथ का दल अपने आप चला जाता है, वैसे ही भाग्य की अनुकूलता होने पर लक्ष्मी विना प्रयत्न के प्राप्त हो जाती है और प्रतिकूलता होने पर अकस्मात् चली जाती है।
कर्म
पुण्यशाली मनुष्य खाद्य, स्वाद्य, पवित्र सुगन्धित पान और लेह्य (चाटने योग्य पदार्थ) तथा इनके संयोग से निर्मित स्वादिष्ट भोजन स्वर्णादि की थालियों आदि में खाते हैं, इनके पुण्य से रसोईया द्वारा निर्मित कुछ भी भोजन अमृत के समान जान पड़ता है।
कर्म
कर्मों की गति- श्रीकृष्ण जी ने जब कंस को मार डाला तो उसकी स्त्री जीवद्यशा प्रतिनारायण पद के धारी अपने पिता जरासन्ध के पास गयी और उससे कहा कि आपके रहते हुये कंस जैसा पति और चाणूर जैसा पहलवान कृष्ण ने मार डाला, इतना सुनते ही जरासन्ध की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो गयी, तब जरासन्ध ने अपने बेटे को यादव कुल के नष्ट करने को कहा, तो कृष्ण का सामना करते हुए वह मारा गया, पुन: जरासन्ध ने अपने छोटे भाई अपराजित को आदेश दिया, कृष्णजी से युद्ध में वह भी मारा गया, अब जरासन्ध स्वयं यादवों को नष्ट करने की बुद्धि से निकला, इस बात का समाचार वसुदेव और समुद्रविजय आदि को मिला, तो इन सब ने जरासन्ध की शक्ति का विचार करते हुए मथुरा नगरी को छोड़कर जङ्गलों में रहने का निश्चय किया, चूँकि नेमिनाथजी का जन्म हो चुका था, फिर भी इनको मथुरा छोड़कर जाना पड़ा, जिस स्थान पर यादव वंशी छिपे हुए थे, उसी रास्ते से जरासन्ध अपनी सेना लेकर निकल रहा था, तब यादव लोग भी युद्ध की तैयारी करने लगे कि अब सामने आये शत्रु का सामना करना है, इस बुद्धि से समुद्रविजय, उग्रसेन, वसुदेव आदि दसों भाई युद्ध को तैयार हुये एक देव ने आकर सैकड़ों जलती हुयी चितायें विक्रिया से दिखा दीं और वह देव वृद्धा माँ का रूप बनाकर रोने लगा, जरासन्ध ने इन जलती हुयी चिताओं को देखकर पूँछा! कि ये चिताएँ किसकी जल रही हैं और आप क्यों रो रही हो, तब वृद्धा ने कहा कि यादव वंशी राजा मथुरा छोड़कर इस जङ्गल में आपके भय से छिप गये थे, लेकिन आपका यहाँ आगमन हो गया, इसलिए सभी यादव इनमें जलकर मर गये, इनमें मेरा पति भी मर गया है, मैं यादव वंशीय राजाओं की दासी हूँ, मुझसे अग्नि में प्रवेश नहीं किया गया है इसलिए में रो रही हूँ, इस प्रकार का समाचार सुनकर जरासन्ध अपने नगर वापस चला गया, उधर श्री नेमिनाथजी और कृष्णजी के प्रभाव से देवों ने द्वारिका नगरी की रचना की, सब नगर के बीचों-बीच कृष्ण जी का अठारह खण्ड का सर्वतोभद्र नामक महल बनाया और समुद्रविजय आदि दस भाईयों का आठ खण्ड का महल बनाया, कृष्णजी के साढ़े तीन करोड़ कुमार रणविद्या में कुशल थे, वे कृष्णजी जरासन्ध से कैसे जीते जा सकते थे।
कर्म