Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 424

आ. ज्ञानसागरजी का व्यक्तित्व

3 सूत्र

चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागर जी- शक् संवत् 1784/विक्रम संवत् 1929, अश्विन कृष्णा षष्ठि (25 जुलाई 1872 बुधवार की रात) को भोजग्राम में पिता भीम गौड़ा, माता सत्यवती के यहाँ जन्म हुआ, आपका नाम सत्यगौड़ा एवं दामोदर भी था। नौ वर्ष की उम्र में सात वर्ष की कन्या के साथ विवाह हुआ, सोलह माह बाद पत्नी की मृत्यु हो गयी, पुनः विवाह कराने से इनकार कर दिया, बैल बीमार होने पर अनुकम्पा वश स्वयं हल जोता एवं मुनि सिद्धसागरजी से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। बत्तीस वर्ष की उम्र में वृद्धा माँ को पीठ पर बैठाकर सम्मेदशिखर जी की वन्दना करायी एवं स्वर्णभद्रकूट पर आजीवन घी और तैल का त्याग किया। सैंतीस वर्ष की उम्र में पिता का वियोग हुआ, उसी दिन से एक आहार एक उपवास का नियम लिया। आचार्य देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा का निवेदन किया, फिर उत्तूर ग्राम में विक्रम संवत् 1972 (सन् 1915) में क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त हुई। मार्च मङ्गलवार सन् 1920 यरनाल कर्नाटक में मुनि देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा, आठ अक्टूवर सन् 1924 बुधवार को समडोली में आचार्य पद, गजपन्था जी सन् 1937 में चारित्र चक्रवर्ति की उपाधि एवं अठारह सितम्बर सन् 1955 रविवार को कुन्थल गिरी सिद्ध क्षेत्र में भाद्र शुक्ला द्वितीया के दिन समाधि हुयी। मुक्ता गिरी, श्रवण बेलगोला एवं सोनागिर में क्रमशः तीन बार शेर निकट आया, जङ्गल के मन्दिर में रात भर चींटियों का उपसर्ग हुआ, अठारह करोड़ जप किये, छत्तीस बार भगवति आराधना का स्वाध्याय किया, नौ हजार नौ सौ अड़तीस उपवास किये, छत्तीस दिन सल्लेखना चली, शिथिलाचार परिहार हेतु गुरू ने शिष्य से पुनः दीक्षा ली, आचार्य विद्यानन्दी जी कहते थे कि आचार्य शान्तिसागर जी की साधना के आगे हमारी साधना कुछ भी नहीं है।
समाधि
आचार्य ज्ञानसागर जी का व्यक्तित्व कर्तृत्व- जन्म वि.सं. 1951 माघ-मास, छाबड़ा-गोत्र, पिता-चतुर्भुज, माँ-घृतवरीदेवी, ग्राम-राणोली, जिला-सीकर राजस्थान, खण्डेलवाल जाति, पाँच भाई, आप दूसरे नम्बर के थे, आठ वर्ष में पिता की मृत्यु, आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में, बाद में बड़े भाई छगनलाल जी के साथ 'गया' (विहार) नौकरी हेतु गये, पुन अध्ययन हेतु बनारस गये, गङ्गा घाट पर गमछा बेचकर आजीविका चलाते थे, शास्त्री परीक्षा उत्तीर्ण की, आजीवन ब्रह्मचर्य लिया, दयोदय, भद्रोदय, सुदर्शनोदय, वीरोदय, जयोदय, विवेकोदय आदि कवि कालीदास के ही जैसी रचनायें की।
ज्ञान
1978 में अजैन छात्रा किरण टण्डन ने आचार्य ज्ञानसागरजी के व्यक्तित्व-कर्तृत्व पर कुमायु विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आचार्यश्री ने वि.सं. 2004 में सात प्रतिमा ग्रहण की थी, वि.सं.2012 में क्षुल्लकदीक्षा और वि.सं.2014 में शिव सागर जी से मुनि दीक्षा जयपुर खानियाजी में ग्रहण की थी और बाद में आचार्य पदारोहण हुआ। 30 जून 1968 को अजमेर में कन्नड़ भाषी विधाधर बालक को मुनि दीक्षा दी। 75 वर्ष की उम्र में चार-पाँच घण्टा न्याय, व्याकरण, साहित्य सिद्धान्त आदि पढ़ाते थे। 22 नवम्बर 1972 को नसीराबाद में आचार्यपद अपने शिष्य विद्यासागर जी को देकर, समाधि की याचना की। 1 जून 1973 को नसीराबाद में समाधिमरण हुआ।
समाधि