Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 390

श्रीपाल जी का भवान्तर श्रवण

2 सूत्र

श्रावक के व्रतों को अङ्गीकार किया, कुछ दिन तक व्रतों का पालन किया बाद में कुसङ्गति के कारण व्रत छोड़ दिये, मिथ्यादृष्टि बन गया और भव-भव में दुःख उठाए, व्रत भङ्ग के कारण राज्य से च्युत होना पड़ा, अतः प्राणों के वियोग होने पर भी व्रत भङ्ग नहीं करना चाहिए।
संयम
ऋद्धिधारी मुनिराज का शरीर कुष्ठ रोग से पीड़ित था, उनको देखकर आपने निन्दा की और सात सौ लोगों ने समर्थन किया, जिससे उन सभी को कुष्ठी होना पड़ा, अतः प्राणों का वियोग होने पर भी कभी मुनियों की निन्दा नहीं करना चाहिए।
वाणी