Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 314

विजय का शुक्लपक्ष मे ब्रह्मचर्य।

5 सूत्र

जिसकी रसना वश में है, उसे ब्रह्मचर्य से कोई नहीं डिगा सकता है।
ब्रह्मचर्य
ऐश्वर्य का आभूषण सज्जनता है, शौर्य का आभूषण वाणी संयम है, ज्ञान का आभूषण शान्ति है, कुल का आभूषण विनय है, धन का आभूषण सुपात्र में व्यय (दान) करना है, तप का आभूषण क्रोध नहीं करना है, बल का आभूषण क्षमा है, धर्म का आभूषण माया का अभाव है और इन ''सबका आभूषण ब्रह्मचर्य है''।
ब्रह्मचर्य
''ब्रह्मचर्य के द्वारा निःसन्देह तीनों लोको को वश में किया जा सकता है एवं शीलवानों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।''
ब्रह्मचर्य
विजय का ब्रह्मचर्य- विजय जब पाठशाला पढ़ता था, तब शुक्लपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया और विजया भी जब पाठशाला पढ़ती थी, तभी कृष्णपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया था, आगे चलकर उन दोनों की शादी हो गयी, उन्होंने पूरे जीवन भर भाई बहन का व्यवहार किया। किसी गृहस्थ से जीवानी गिर गई थी, प्रायश्चित्त के रूप मे मुनि महाराज ने शीलव्रत धारी दम्पत्ति को भोजन कराने को कहा, अगर ऊपर का काला चँदोवा सफेद हो जाए, तो समझ लेना मेरा प्रायश्चित्त पूरा हो गया, विजय-विजया दम्पत्ति को भोजन कराने से काला चँदोवा सफेद हो गया था।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्माचारी के दर्शन से आँख ठीक हुई- एक जन्मान्ध ने मुनिराज से पूछा हमारी आँखें कब ठीक होगीं? तब मुनिराज ने कहा कि विवाह से बारह वर्ष तक जिसने ब्रह्मचर्य पाला हो उसके दर्शन से ठीक होंगी।
ब्रह्मचर्य