Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 199

मायाचारी के प्रकार- किशमिश, बेर, नारियल, छुहारा।

9 सूत्र

जो वक्रता पूर्ण चिन्तन नहीं करता, वक्रता पूर्ण चेष्टा नहीं करता और वक्रता पूर्ण वचन नहीं बोलता तथा अपने दोषों को नहीं छुपाता है उसके 'आर्जव धर्म' होता है।
चरित्र
मित्र अधिक पढ़कर ज्यादा नम्बर न ले आये, इसलिये सिनेमा के लिए निमन्त्रण देना।
चरित्र
'मन में होए सो वचन उचरिये, वचन होए सो तन सो करिये' यह कथन महा मुनियों की अपेक्षा है जिनके मन में हमेशा प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव रहता है, वे अपने मन के भाव वचन से कहते हैं तो प्राणियों का भला होता है, और शरीर से करते हैं, तो प्राणी मात्र का कल्याण होता है, अन्य प्राणियों के लिए इस तरह से है, कि मन में होए सो मन मे रखिये, वचन होए तन सो न करिए, अगर वे अपने मन की बात कहेंगे तो अन्य का अहित होगा, क्योंकि उनके मन में प्रायः दुर्भाव रहता है और करेंगे तो अनेकों का सत्यानाश होगा, दूसरी बात एकेन्द्रियादि के मन के विना भी मायाचारी होती है एवं ध्यान में लीन मुनिराज के आर्जव धर्म होता है तथा तीनों योगों से रहित सिद्धों के भी आर्जव धर्म होता है, अतः आंतरिक वक्रता का नाम माया एवं सरलता का नाम आर्जव धर्म है, मन वचन काय पौद्गलिक हैं और आर्जव धर्म आत्मिक गुण है।
चरित्र
घर पर आये पड़ोसी के पुत्र को मिठाई, खिलौना आदि देना, जिससे उसकी माँ समझे कि इनका मेरे परिवार पर बड़ा स्नेह है।
चरित्र
मालिक की दुकान पर मेहनत इसलिए करना कि मेरी चोरी न पकड़ में आ जाय।
चरित्र
भोगों में रस लेते हुए भी ऊपर से विरक्ति दिखाना, मुझे तो शान्ति चाहिए, शरीर आत्मा भिन्न-भिन्न है, भोग तो बहुत भोगे इत्यादि।
चरित्र
स्वर ताल से भक्ति करता है, ताकि लोग धर्मात्मा समझें और पुत्र का रिश्ता बड़े घर से हो जाय।
चरित्र
लालच के कारण प्रतिमा स्थापित कराना, मन्दिर बनवाना, आहार दान देना, ताकि अधिक धन का लाभ हो।
चरित्र
दान इसलिए कि प्रतिष्ठा प्राप्त हो, लोग धनिक समझें, दुआ प्राप्त हो जाय, भोगभूमि या स्वर्ग सुख मिले।
दान