Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 196

विद्या गुरु को ऊपर बैठाना।

4 सूत्र

विद्या गुरु को ऊपर बैठाना- एक बार एक भील की स्त्री को दोहला हुआ कि मुझे आम खाने को मिल जाय, लेकिन उस समय आम का मौसम नहीं था, फिर भी तीव्र इच्छा हुयी भील से अपनी भावना व्यक्त की, भील ने सारे जङ्गल को खोज डाला लेकिन कहीं पर भी आम नहीं मिला, भील को मालूम हुआ, कि राजा श्रेणिक के बगीचे में इस समय आम उपलब्ध हैं। वह अन्तर्धान नामक विद्या के माध्यम से बगीचे से आम ले आया, रोज आम लाता लेकिन पहरेदार पकड़ नहीं पाते, एक दिन भील पकड़ा गया, राजा के सामने उपस्थित किया, राजा उसकी विद्या पर प्रसन्न हुआ, और राजा ने कहा कि तू अपनी विद्या हमें सिखा दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा। भील तैयार हो गया। बहुत देर तक विद्या सिखाता रहा लेकिन राजा सफल नहीं हुआ, तभी अभय कुमार निकले उन्होंने कहा, राजन! गुरू को ऊपर विठाओ और आप नीचे बैठों तब विद्या सिद्ध होगी।
विनम्रता
जिनेन्द्रवर्णी जी आचार्यश्री विद्यासागर जी के दर्शन करने के लिए रामटेक आये और पीछे बैठ गये, आचार्यश्री ने पहले कभी उनको देखा नहीं था, सभा के बाद उनका परिचय कराया, तब वर्णीजी आचार्यश्री के चरणों में लोट गये, आचार्यश्री ने कहा थोड़ा आप बोलो तब वर्णीजी ने कहा ''मैं छोटा सा कीड़ा आपके सामने कैसे बोलूँ'' ये उनकी विनम्रता थी।
विनम्रता
जिनेन्द्र वर्णी विनय की मूर्ति- जिनेन्द्रवर्णीजी आचार्यश्री के पास जब सल्लेखना लेने के लिए ईसरी सन् 1983 में आये, उस समय आचार्यश्री स्वाध्याय करा रहे थे, किसी विषय का अर्थ अस्पष्ट था, तब क्षमासागरजी ने वर्णी जी से कहा कि आपके पास इसका समाधान है?, वर्णीजी ने कहा! हाँ, क्षमा सागर जी बोले! फिर आप इतनी देर से मौन क्यों हैं? तब वर्णी जी बोले कि इतने बड़े आचार्य के सामने मैं नगण्य कैसे बोलता।
विनम्रता
बेर और किशमिश- बेर की मृदुता ऊपर रहती और किसमिस की मृदुता भीतर बाहर एक सी होती है इसी तरह सज्जन भीतर बाहर से मृदु होते हैं, और दुर्जन बाहर से मृदु और अन्दर से कठोर होते हैं।
चरित्र