बीमार के लिए, धनहीन के लिए, परदेश गये हुए के लिए व शोक से दुःखी मनुष्य को मित्र का दर्शन औषधि के समान है। संगति 0 – भेजें
जैसे बने तैसे अज्ञान रूपी अन्धकार को हटाकर जिनशासन का माहात्म्य फैलाना प्रभावना कहलाती है। धर्म 0 – भेजें
पवित्रता, त्यागशीलता, शूरवीरता, सुख-दुःख में समानता, सरलता, अनुराग और सत्य व्यवहार ये मित्र के गुण हैं। संगति 0 – भेजें
इस असार संसार में मन के विश्वास के पात्र स्वभाविक मित्र की प्राप्ति होना 'निःसन्देह यही सार' है। संगति 0 – भेजें
रहस्य प्रकट करना, याचना करना, निर्दयता पूर्ण व्यवहार करना, चित्त की चञ्चलता, क्रोध, असत्य भाषण और जुआ खेलना ये मित्र के दूषण हैं। संगति 0 – भेजें
नाना दुःखों के कारण कुमार्ग में आसक्त मन वाले मित्र को जो रोकते नहीं हैं वे मानों भयङ्कर सर्पों से व्याप्त गहरे कुंए में गिरने कि प्रेरणा करते हैं। संगति 0 – भेजें
यदि किसी से उत्कृष्ट प्रीति रखना चाहते हो तो उससे वाचनिक विवाद, अर्थ का लेन-देन और परोक्ष में उसकी स्त्री से सम्पर्क ये तीन काम मत करो। संगति 0 – भेजें
देना, लेना, गुप्त बात कहना, गुप्त बात पूँछना, भोजन करना और कराना ये छः प्रीति के लक्षण हैं। संगति 0 – भेजें
'आइये-आइये, इस आसन पर बैठिये, आपके दर्शन से मैं प्रसन्न हुआ हूँ, क्या समाचार है, प्रतिकूलता में भी आप प्रसन्नता बनाए रखते हैं, बहुत समय बाद क्यों आए हो' इस प्रकार घर पर आये हुए मित्र से जो आदर पूर्वक सम्भाषण करते हैं उनके घर संशय रहित मन से सदा ही जाना चाहिए। संगति 0 – भेजें
गाँठ में दाम, परलोक में धर्म, विदेश में विद्या, जीवन में सच्चरित्र, कष्ट में सद्बुद्धि, बुढ़ापे में माला ये छः मित्र कहे गए हैं। संगति 0 – भेजें