Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 309

मोह जीतने के उपाय।

1 सूत्र

मोह के भेदों को अपना व अपने रूप मानता है, इसलिए परिग्रह बन जाता है, पहले उसे उल्टा कर दें, जैसे पारसनाथ आदि के प्रति विशेष भक्ति रख अनायतन से बचना चाहिये, अनन्तर वस्तुस्वरुप का यथार्थ श्रद्धान कर मिथ्यात्व से बचना चाहिए, संसारी प्राणी कहता है, तुमने मेरे क्रोध को नहीं देखा, अर्थात् अज्ञान से क्रोध को अपना मानता है, पहले क्रोध पर क्रोध करना एवं ''क्षमा से क्रोध को जीतना चाहिए'', इसी तरह मान के उदय से कहता है, कि तुम मेरे को क्या समझते हो? जबकि पुण्य के उदय से कुछ शक्ति धन ज्ञानादि मिला है, अतः जैनत्व का स्वाभिमान रखकर आत्म कल्याण के विषय में सोचना चाहिए एवं ''विनय से मान को जीतना चाहिए'', इसी तरह दूसरे को ठग कर अपने आप को बुद्धिमान समझता है और कहता है मुझे किसी ने नहीं पकड़ पाया, पहले पाप से बचने के लिए मायाचारी करना चाहिए, और मायाचारी को तिर्यञ्चआयु का कारण समझकर ''सरलता से माया को जीतना चाहिए'', लोभ कषाय के उदय से पर पदार्थ को अपनाना चाहता है, जबकि लोभ को पाप का बाप कहा है, अतः पहले स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति का लोभ होना चाहिए, व ''सन्तोष से लोभ को जीतना चाहिए'', अज्ञानी प्राणी दूसरों की कमजोरियों की हँसी उड़ाता है, उसे ''स्वयं की कमियों पर हँसना चाहिए'', इसी प्रकार पहले ''पञ्च परमेष्ठी से रति होना चाहिए'' और विषयों से विरक्ति होना चाहिए, ''पाप के स्थानों से अरति होना चाहिए'', अपने द्वारा किये हुए ''पापों का शोक होना चाहिए'', नरक आदि ''दुर्गतियों में जाने का भय होना चाहिए'', अपने ''दोषों के प्रति जुगुप्सा (ग्लानि) होना चाहिए'', मुक्ति स्त्री की कामना रखते हुए, ''स्त्री मात्र से विरक्ति होना चाहिए'', ''गलत कार्य करने के विषय में नपुंसक बन जाना चाहिए'' एवं ''अपने को पुरुष अर्थात् आत्मा मानकर मोक्ष का पुरुषार्थ करना चाहिए'' और ''कषाय मात्र का त्याग करना चाहिए''।
संयम