Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 84

हमारी आँखें : जीवन का आधार

1 सूत्र

मनुष्य के पास पाँच इन्द्रिय हैं। यथा–चक्षु (आँख), नाक, कान, रसना और स्पर्शन। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चक्षु अर्थात् आँख है। आँख के अभाव में मनुष्य का जीवन अत्यधिक कठिन है। आँख से मनुष्य के स्वभाव का परिचय मिल जाता है। मनुष्य स्वभाव से कठोर, क्रोधी, नम्र, वात्सल्य पूर्ण अथवा स्नेहमयी है, यह उसकी दृष्टि से झलक जाता है। मनुष्य दो प्रकार के कर्म करता है। १. शुभ अथवा पुण्य कर्म, २. पाप कर्म। आँखें मनुष्य के लिए वरदान है। उसके माध्यम से मनुष्य पुण्य एवं पाप कर्म का बंध करता है। जहाँ एक ओर अच्छी दृष्टि के द्वारा १०० प्रतिशत पुण्य कर्म अर्जित कर सकता है। वहीं मनुष्य को जितना पाप कर्म का बंध होता है, उसका बहुभाग लगभग ८३ प्रतिशत आँख (दृष्टि) के माध्यम से होता है। शेष लगभग १७ प्रतिशत पाप कर्म अन्य शेष चार इन्द्रियों से होता है। यथा–कान (कर्ण), नाक (घ्राण), रसना और स्पर्शन के माध्यम से होता है। मनुष्य आँख के माध्यम से ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है। जिनवाणी के पठन-पाठन में आँखों का योगदान महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानार्जन के लिए आँखें आवश्यक हैं।
कर्म